कैसे हिंदुस्तान का एक मशहूर स्क्रिप्ट राइटर और कामयाब इंसान बना नास्तिक… जावेद अख्तर 

कैसे हिंदुस्तान का एक मशहूर स्क्रिप्ट राइटर और कामयाब इंसान बना नास्तिक… जावेद अख्तर जो हमेशा सुराखियों में बने रहते हैं उनके लिए अंग्रेजी में यह कहा जाता है You Can Like Him, You Can Hate Him, But You Cannot Ignore Him यह लाइन जावेद अख्तर पर एकदम फिट बैठती है I जावेद अख्तर अक्सर कुछ ऐसा करते हैं जो कि वह हर वक्त सुर्खियों में बने रहते हैं, सोशल मीडिया पर ट्विटर पर अक्सर वह किसी पर झगड़ते हुए नजर आते हैं, आप उन्हें पर्सनली पसंद करें या ना करें, आप उनके पॉलिटिकल टिप्पणियों से सहमत हो या ना हो, लेकिन एक चीज आपको माननी पड़ेगी की फिल्म जगत की काफी समझ है I उन्होंने फिल्में लिखी है, डायलॉग लिखे हैं, स्क्रीन प्ले लिखा है गाने लिखे हैं और यहां तक की फिल्मों की कास्टिंग भी तय की है I

आज हम जानेंगे 1960 और 70 के दशक के मशहूर फिल्म राइटर, शायर और पटकथा लेखक जावेद अख्तर के बारे में 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में जावेद अख्तर का जन्म हुआ, इनके पिता को सब जानते हैं वह एक मशहूर कवि जाँनिसार अख़्तर थे, और बहुत कम लोग यह जानते हैं कि जावेद की मां सफिया अख्तर भी मशहूर उर्दू लेखिका और शिक्षिका थी, और वह अपने दौर में कॉलेज में पढ़ाया करती थी I अपने दौर के मशहूर शायर मुजफ्फर खैराबादी जावेद अख्तर के दादा थे, इस बात से यह अंदाजा लगया जा सकता है कि जावेद अख्तर को बचपन में ही एजुकेशन, शायरी, नॉलेज विरासत में मिली है I

  बचपन में सब जावेद को जादू कहकर पुकारते थे उसके पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा यह है कि जब जाँनिसार अख्तर और सफिया अख्तर की शादी हुई, तो जाँनिसार अख्तर ने कुछ रोमांटिक शायरी सफिया अख्तर के लिए लिखी थी, और उसे शायरी में जादू यह शब्द लिखा हुआ था और यह जादू वहां से उठकर उनके नाम  से जुड़ गया और बचपन में बहुत सालों तक सब उन्हें जादू कहकर पुकारा करते जब स्कूल में दाखिला करवाने की वक्त आया तब जादू से मिलता जुलता नाम ढूंढ कर जावेद रखा गया I

पिता ने जावेद के कान में घोषणा पत्र कह दिया : 

बचपन से ही जावेद अपनी मां से बहुत ज्यादा करीब थे, क्योंकि उनके पिता अपना ज्यादा वक्त घर से बाहर ही बिताते थे, और वह घर वालों को बहुत कम वक्त देते थे, क्योंकि वह कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर थे और बड़े ही क्रांतिकारी स्वभाव के थे I उस दौर में कम्युनिस्ट पार्टी वाले सरकार के द्वारा वांटेड लिस्ट में थे  इसकी वजह से जावेद के पिता घर से भागे हुए और अंडरग्राउंड रहते थे I जावेद अख्तर के साथ उनकी मां ही रहती थी, इन फैक्ट जावेद अख्तर के पिता अपने काम में इतने मसरूफ, बिजी रहते थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नॉर्मली जब मुस्लिम परिवार में कोई बच्चे की पैदाइश होती है तो उसके जन्म के बाद उसके कान में अजान दी जाती है, लेकिन जाँनिसार अख्तर ने अपने बच्चे के पैदाइश के बाद उसके कान में अजान देने की बजाय कम्युनिस्ट पार्टी का मेनिफेस्टो यानी घोषणा पत्र कह दिया I

  जावेद सिर्फ 8 साल के थे जब उनकी मां का आंचल उनके सर से उड़ गया, उस 8 साल के बच्चे की हालत कैसी होगी कि जिसके सबसे ज्यादा वह करीब था, जिसे वह प्यार करता था वह दुनिया में नहीं रहा, और जो साथ थे अपने पिता से कभी करीब नहीं था इसीलिए उनकी मां के इंतकाल के बाद नाना और नानी जावेद और उनके छोटे भाई सलमान को अपने साथ लखनऊ ले गए I कुछ वक्त बीतने के बाद जावेद अख्तर को लखनऊ से अलीगढ़ उनके खाला यानी की मौसी के यहां भेजा गया, क्योंकि दोनों बच्चों के पालन पोषण और उनके परवरिश का बोझ एक ही परिवार पर ना पड़े I मां तो थी नहीं और पिता जो थे उनसे भी वह दूर हो गए, क्या हालत होगी उन दो बच्चों की मां बाप के दूर होने के बाद अब एक दूसरे से भी अलग हो गए I

जावेद अख्तर का दिमाग काफी तेज था, जावेद ने अपने सारे ताकत पढ़ाई में लगाइ सिर्फ पढ़ाई की किताबें नहीं बल्कि पढ़ाई के अलावा लिटरली किताबें यानी की साहित्य किताबें उस पर भी अपनी पूरी ताकत लगाइ I  फिर चाहे हो Faiz Ahmed Faiz की शायरी की किताब हो, या फिर Saadat Hasan Manto की कहानियाँ हो, या फिर Ismat Chughtai की नोवेल्स हो या फिर Ibn-e-Safi के डिटेक्टिव थ्रिलर्स, जावेद ने यह सारी किताबें पढ़ डाली I Ibn-e-Safi के राइटिंग से जावेद अख्तर इतना प्रेरित हुए थे, की शोले फिल्म का जो सीन है जय का मौसी के पास जाकर वीरों के बारे में उल्टा सीधा बोलना वह काफी हद तक Ibn-e-Safi की नोवेल्स The House Of Fear से काफी इंस्पायर है I 

अलीगढ़ अपने रिश्तेदारों के यहां पर रहकर बहुत फिल्में देखी और बहुत सी किताबें पढ़ी अपना एग्जाम भी जावेद ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय से ही दिया था, इसके बाद उनके पिता जाँनिसार अख्तर उन्हें अलीगढ़ से भोपाल ले गए I भोपाल आने के बाद जावेद साहब 4 साल तक एक हॉस्टल में रहे, और वहां उन्होंने अपना कॉलेज भी पूरा किया, और फाइनली कॉलेज में उन्होंने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया I पहली बार कॉलेज में जावेद अख्तर ने शायरी लिखी, और डिबेट कंपटीशन में भी पार्टिसिपेट किया, और उसे डिबेट में जो वह बोलते थे और जो वह लिखते थे, उसकी वजह से जावेद अख्तर अपने कॉलेज में बहुत ज्यादा मशहूर हो गए I

उनका वह डिबेट और उनके ऊपर शायरी लिखना उस जमाने में कहीं ना कहीं यह वह शुरुआत थी उनकी स्क्रिप्ट राइटिंग और सॉन्ग राइटिंग एबिलिटी की I वह वक्त था जब जावेद अख्तर के पिता जाँनिसार खुद को मुंबई में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने आप को As A Film Writer, Specifically As A  Songwriter खुद को एस्टेब्लिश कर चुके थे I जावेद के लिए यह फिल्मों के लिए गाने कैसे लिखते हैं, या फिल्म की राइटिंग कोई अनजान या नई बात नहीं थी, क्योंकि यह उनके परिवार में हो रहा था I जावेद को फिल्मों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी थी और वह कॉलेज में थे तो कहीं ना कहीं उस दौरान वह चाहते थे कि मैं फिल्म की स्क्रिप्ट लिखो और फिल्म का डायरेक्शन भी करो I 

मशहूर फ़िल्म निर्देशक और निर्माता गुरु दत्त साहब की 1957 में आई फिल्म प्यासा से जावेद अख्तर काफी ज्यादा आकर्षित हुए, और गुरु दत्त साहब से ही वह फिल्म मेकिंग सीखना चाहते थे, और इसी सपने को लेकर जावेद अख्तर 4 अक्टूबर 1964 को भोपाल से मुंबई आए I अब किस्मत का खेल देखिए जिस  इंसान से मिलने के सपने अपने आंखों में संजोग कर जावेद भोपाल से मुंबई आए वह उनसे कभी मिल नहीं पाए I जावेद अख्तर के मुंबई आने के एक हफ्ते में ही 10 अक्टूबर 1964 को गुरुदत्त साहब का निधन हुआ,  गुरु साहब से ना मिल पाना यह जावेद अख्तर की जिंदगी का सबसे बड़ा रिग्रेट यानी पछतावा था I 

जावेद अख्तर किसी तरह से मुंबई पहुंच गए थे, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह किसी होटल में या किसी ऐसी जगह पर रहे जहां पैसों का लेन देन होकर उन्हें रहने को जगह मिले, तो उस वक्त वह एक ऐसे इंसान से मिले जिन्हें वह जानते थे, वह शख्स थे उनके पिता जाँनिसार अख्तर पर वह अपने पिता से इतने करीब नहीं थे लेकिन मजबूरी थी I प्रॉब्लम यह थी की जाँनिसार अख्तर  दूसरी शादी कर ली, जावेद  कुछ दिन उस घर में रहे लेकिन उन्हें उस घर में अनकंफरटेबल सा लगने लगा अपने सौतेली मां के साथ एक ही घर में रहने और तब उन्होंने वह घर छोड़ दिया I अपने पिता का घर छोड़ दिया और अगले 5 साल तक जावेद अख्तर के सर पर कोई मजबूत छत नहीं थी, और ना ही उनका कोई परमानेंट एड्रेस था, दोपहर तक यह समझ नहीं आता था कि आज की रात कहां गुजरेगी या कहां बितानी है, जैसे तैसे करके 5 साल गुजारे I

काम मांगने के लिए जावेद अख्तर ने कभी भी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल नहीं किया, उन पांच सालों में जावेद अख्तर ने बहुत से छोटे-मोटे काम किए, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े सर्वाइव करने के लिए, जैसे कि वह क्लैपर बॉय बने, वो क्लैपर बॉय जो हर शॉट के पहले एक क्लैप देता है जावेद अख्तर वह काम कर रहे थे I उस बीच जब कोई यह कह देता की स्क्रिप्ट लिख दो या डायलॉग लिख दो, या कोई छुट्टी पर है तो उसका काम तुम कर लो इस तरह से जावेद अख्तर ने बहुत से छोटे-मोटे काम किया, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खुद को साबित करने के लिए I

अपने 5 साल मुंबई के हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के स्ट्रगल में जो पहले साल गुजर बतौर क्लैपर बॉय वह था एक बहुत ही फेमस फिल्म मेकर फिल्म पाक़ीज़ा के निर्देशक कमल अमरोही के लिए, इस फिल्म में दिग्गज अदाकारा ट्रेजेडी क्वीन कहीं जाने वाली मीना कुमारी ने शानदार अभिनय और कमाल के एक्सप्रेशन किया, कमाल की बात तो यह है कि यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में याद रखा जाएगा कि कमल अमरोही  ने जावेद अख्तर को अपने यहां पर एम्पलाई रखा था सिर्फ ₹50 महीना तनख्वाह पर I यह वह वक्त था जब जावेद अख्तर के पास सिर्फ तीन जोड़ी कपड़े हुआ करते थे, और वह वक्त भी था जब जावेद अख्तर के पास अक्सर करके रात को सोने का ठिकाना नहीं होता था, तो उस वक्त अमरोही साहब के स्टूडियो कमलिस्तान के एक स्टोर रूम में सोया करते थे I

कमल अमरोही के स्टूडियो में बहुत से कमाल की चीज हुई, जावेद अख्तर जीस स्टोर रूम में वह सोते थे वहां एक जूते की अलमारी थी, एक रात जावेद अख्तर को उस जूते की अलमारी से तीन फिल्म फेयर कि ट्रॉफी मिली, जो ट्रेजेडी क्वीन अदाकारा मीना कुमारी जी की थी I उस रात के बाद जावेद अख्तर का उस स्टोर रूम में रहना थोड़ा आसान हो गया, और वह अक्सर ट्रॉफी को अपने हाथ में पकड़ कर सोया करते, और कभी-कभी उठकर उन ट्रॉफी को पड़कर स्पीच भी दिया करते थे, वह ऐसा सोचते थे कि यह ट्रॉफी एक दिन उन्हें मिलेगी और लोग उनके लिए तालियां बजाएंगे I

1 साल निर्देशक कमल अमरोही के यहां काम करने के बाद जावेद अख्तर ने वह कर दिखाया जो कॉरपोरेट लाइफ में काम करने वाला हर इंसान कभी ना कभी करता है Job Switch यानी नौकरी बदलना, अब जावेद अख्तर एक ऐसी जगह पहुंच गए जहां उनकी मुलाकात हुई, मशहूर फिल्म राइटर सलीम खान से I सलीम जावेद इस जोड़ी के पहले फिल्म राइटर सिर्फ बैकग्राउंड का हिस्सा थे, और फिल्म को बनाने के लिए पर्दे के पीछे फिल्म राइटर, स्क्रिप्ट राइटर ने कितनी मेहनत की यह कोई नहीं जानता था I सलीम जावेद के इस जोड़ी के बाद फिल्म राइटर की अहमियत बढ़ गई और उनको फिल्म के पोस्टर पर दर्जा मिलने लगा, सलीम जावेद की वजह से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में राइटर को पहचान मिली I 

सलीम-जावेद का मिलन : 

1965 में शूटिंग हो रही थी एक ऐसी फिल्म की जो उस जमाने के मशहूर फिल्म निर्माता S. M Sagar  की फिल्म सरहदी लुटेरा और इस फिल्म में सलीम खान एक अदाकार के तौर पर काम कर रहे थे, और उन्हें इस फिल्म में एक छोटा सा रोमांटिक अभिनय करने का मौका मिला था I 1965 से कुछ साल पहले सलीम खान इंदौर से मुंबई एक अभिनेता बने आए थे, और मुंबई आने के बाद उन्होंने काफी संघर्ष किया और कुछ फिल्मों में उन्होंने काम भी किया, लेकिन फिल्मों में उन्हें वह कामयाबी नहीं मिला जिनकी उन्हें तलाश थी I फिर धीरे-धीरे अभिनय के प्रति उनकी दिलचस्पी कम होती गई और उन्होंने उस दौर के मशहूर फिल्म राइटर अबरार अल्वी साहब के यहां पर लेखक के असिस्टेंट के तौर पर काम करने लगे, और धीरे-धीरे स्क्रिप्ट राइटिंग और स्टोरी राइटिंग में सलीम खान की दिलचस्पी बढ़ती गई I 

सरहदी लुटेरा  इस फिल्म के शूटिंग सेट पर जावेद अख्तर और सलीम खान की मुलाकात हुई, सलीम खान जो इस फिल्म में एक अभिनेता थे और जावेद अख्तर इस फिल्म के शूटिंग सेट पर एक क्लैपर बॉय थे I सलीम जावेद की जोड़ी कामयाबी के शिखर पर एक साथ ही चढ़ी थी, इस फिल्म के दौरान ही इन दोनों के बीच दोस्ती हुई I 70 के दशक में स्क्रिप्ट राइटर, स्टोरी राइटर, स्क्रीन प्ले को ज्यादा महत्वपूर्ण समझा नहीं जाता था, और उनकी काम की कीमत भी बहुत कम मिलती I सलीम जावेद के इस जोड़ी में सब कुछ बदल कर रख दिया, और इसका सहरा सुपरस्टार अदाकार राजेश खन्ना के सर सजता है I

 सुपरस्टार राजेश खन्ना ने एक फिल्म साइन की थी, वह फिल्म थी हाथी मेरे साथी लेकिन इस फिल्म की कहानी उन्हें कुछ खास पसंद नहीं आई, पर इस फिल्म के लिए उन्हें काफी बड़ी रकम मिल रही थी, और उन्हें इस फिल्म की फीस से अपना बंगलो आशीर्वाद खरीदना था, उस वक्त खन्ना साहब ने सलीम जावेद से कहां कि तुम इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिख दो और यहां से शुरुआत हुई सलीम-जावेद की जोड़ी की I इसके बाद जीपी सिप्पी की कंपनी Sippy films में इन्हें बतौर स्क्रीन राइटर नौकरी मिल गई, और यहां पर इन्होंने इतिहास रच दिया, और एक से बढ़कर एक फिल्मों में स्क्रिप्ट लिखी, जैसे कि अंदाज, सीता और गीता, शोले और डॉन जैसी सुपरहिट फिल्में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को दी I 

सलीम जावेद इस जोड़ी ने लगातार 12 सालों तक एक साथ काम किया, और इन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में बनाई, यादों की बारात, जंजीर, हाथ की सफाई, दीवार, क्रांति और मिस्टर इंडिया इन फिल्मों के जरिए सलीम-जावेद न सिर्फ अपना नाम बनाया बल्कि और जितने भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लेखक थे उनको एक नई पहचान दिलवाई, और उन्हें इज्जत भी दिलवाई I साल 1982 के बाद यह दोनों अलग हो गए, और इन दोनों ने ही प्रेस और मीडिया के सामने एक दूसरे के बारे में कभी भी कोई गलत बात नहीं कही, जब भी किसी ने पूछा कि ऐसा क्या हुआ कि अब दोनों अलग क्यों हो गए, तो यही कहा गया कि हर एक चीज की एक्सपायरी डेट होती है, और इनकी दोस्ती की भी एक एक्सपायरी डेट थी I 

एक और बात सामने आई कि सलीम खान को यह जोड़ी को तोड़ना नहीं था वह कभी नहीं चाहते थे कि वह दोनों अलग हो जाए पर जावेद अख्तर के मन में कुछ और ही चल रहा था, और इसीलिए वह सलीम खान से अलग हो गए I यहां से जावेद अख्तर की जिंदगी की एक नई शुरुआत हुई, बतौर गीतकार इन्हें काम नहीं करना था, लेकिन यश चोपड़ा ने उन्हें काफी समझाया और समझने के बाद उनसे अपने फिल्म सिलसिला के लिए उनसे गाने लिखाएं I फिल्म सिलसिला के जब गाने हिट हुए और हर तरफ से उन्हें तारीफें मिलने लगी, तब जावेद अख्तर ने यह फैसला किया कि अब वह स्क्रिप्ट राइटिंग के साथ-साथ   लिरिक्स यानी की गीत भी लिखेंगे I सलीम जावेद की जोड़ी टूटने के बाद इन दोनों का ही काम स्क्रिप्ट राइटिंग में ज्यादा नहीं चला, बस कुछ ही फिल्में हिट हुई जैसे की सलीम खान लिखी हुई फिल्म नाम और जावेद अख्तर की लिखी हुई फिल्म मशाल I

जावेद अख्तर की निजी जिंदगी : 

जावेद अख्तर की दो शादियां हुई है उनकी पहली शादी मशहूर बाल कलाकार, और मशहूर स्क्रिप्ट राइटर हनी ईरानी से हुई, इस शादी से ज्यादा जावेद को दो बच्चे हुए, बेटा फरहान अख्तर और बेटे जोया अख्तर I जावेद अख्तर के दोनों ही बच्चे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं, फरहान अख्तर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक कामयाब अदाकार, फिल्म निर्माता और एक सिंगर है, और जोया अख्तर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक कामयाब फिल्म निर्देशक, फिल्म निर्माता और एक पटकथा लेखक है, और वह हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियल के लिए काम करती हैं I 

  शादी के 13 साल बाद हनी ईरानी और जावेद अख्तर ने आपसी सहमति से साल 1980 में तलाक ले लिया, इन दोनों के तलाक के वजह थी जावेद अख्तर का हद से ज्यादा शराब पीने की आदत और इसी वजह से इन दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई I बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि इन दोनों के तलाक की वजह हिंदी फिल्मों की अदाकारा शबाना आज़मी की वजह से हुई है, लेकिन हनी ईरानी ने यह साफ कहा है कि उनकी तलाक शबाना आज़मी की वजह से नहीं हुई है और इसे उनका कोई भी संबंध नहीं है I 

साल 1984 में शबाना आज़मी से दूसरी शादी की और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह पावर कपल के रूप में देखे जाते हैं, इस शादी के वजह से शबाना आजमी को काफी ज्यादा आलोचना का सामना भी करना पड़ा था I 41 साल से ज्यादा के सफर में मजबूत और कामयाब शादीशुदा जिंदगी की मिसाल है, और अभी हाल ही में उन्होंने अपने 41 साल पूरे होने के इतने ज्यादा लंबे सफर की कामयाब शादीशुदा जिंदगी का जश्न मनाया I 

जावेद अख्तर को मिले हुए अवार्ड : 

जावेद अख्तर को मिले हुए अवार्ड की बात करें तो इसकी लिस्ट बहुत लंबी है, जावेद अख्तर उन्ह चुनिंदा कलाकारों में से है, जिन्होंने Black and White सिनेमा दिखा, पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना साहब के साथ काम किया, और सलीम जावेद के जोड़ी के रूप में एंग्री यंग मैन की इमेज बनाएं I हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास में जावेद अख्तर का नाम बड़े हैं गौरव से लिया जाएगा  I 

तो दोस्तों यह थी हिंदुस्तान के मशहूर स्क्रिप्ट राइटर और नास्तिक जावेद अख्तर के जीवन का परिचय I












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